छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बिना पेनेट्रेशन के इजैक्युलेशन को 'रेप' नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे 'रेप की कोशिश' के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376/511 के तहत सजा को घटाकर 3.5 साल कर दिया।
कोर्ट का निर्णय
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने यह स्पष्ट किया कि रेप के लिए 'पेनेट्रेशन' एक आवश्यक तत्व है। यदि पुरुष जननांग केवल योनि के ऊपर रखा गया हो और इजैक्युलेशन हुआ हो, तो इसे कानून के अनुसार 'रेप' नहीं माना जाएगा।
मामले का विवरण
यह मामला 21 मई 2004 का है, जब आरोपी ने पीड़िता को उसके घर से जबरन अपने घर ले जाकर शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी।
मुख्य सवाल
न्यायालय ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया। पीड़िता ने पहले पेनेट्रेशन का आरोप लगाया, लेकिन बाद में कहा कि आरोपी ने केवल जननांग को उसके प्राइवेट पार्ट के ऊपर रखा।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने माना कि आरोपी का इरादा आपराधिक था, लेकिन 2013 से पहले के कानून के अनुसार रेप सिद्ध करने के लिए पेनेट्रेशन का स्पष्ट प्रमाण आवश्यक था।
फैसले का महत्व
यह निर्णय 2013 से पहले के कानून की व्याख्या को फिर से सामने लाता है। अदालत ने कहा कि यदि संदेह है, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा।
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